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विनोद खन्ना 25 साल की उम्र में अगर इस मौत के अनुभव से नहीं गुजरते, तो महानायक अमिताभ बच्चन से बहुत आगे निकल जाते

Posted On: 4 May, 2017 Infotainment में

Pratima Jaiswal

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‘मैंने जब से होश संभाला है, खिलौनों की जगह मौत से खेलते आया हूं’

‘कुर्बानी’ फिल्म में विनोद खन्ना का ये दमदार डायलॉग उनकी असल जिंदगी के बेहद करीब था. बचपन से अभिनेता बनने का सपना लिए विनोद एक्टिंग की दुनिया में जाना चाहते थे, लेकिन उनके पिताजी को इससे सख्त ऐतराज था. आपको जानकर हैरानी होगी कि विनोद के पिताजी उनके फिल्मी दुनिया में जाने के इतने खिलाफ थे कि एक दिन उनके ऊपर बंदूक तान दी थी लेकिन विनोद ने हार नहीं मानी और अपनी मां को कहकर पिताजी को मना लिया.


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सालों तक खूब कड़ी मेहनत की और फिल्मी दुनिया का एक नामी सितारा बन गए. एक जमाने में वो इतने हिट होने लगे थे कि अमिताभ बच्चन से उनकी तुलना होने लगी थी, लेकिन फिर उनकी जिंदगी में ऐसा मुकाम आया कि उन्होंने एक ही रात में सबकुछ छोड़कर सन्यास ले लिया. उनकी कहानी में दिलचस्पी रखने वाले ज्यादातर लोगों को आज भी इस बात की जानकारी नहीं है कि आखिर एक कामयाब सितारे ने अचानक दौलत, शोहरत, प्यार और परिवार छोड़कर सन्यास लेने का फैसला क्यों कर लिया.


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माना जाता है कि 24-25 साल की उम्र में अगर विनोद की जिंदगी में मौत से जुड़े ये हादसे नहीं हुए होते, तो वो सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से काफी आगे निकल जाते. दोनों को अपनी दमदार आवाज के लिए भी जाना जाता है.


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मौत का अनुभव जिसके बाद छोड़ दिया कॅरियर

विनोद खन्ना फिल्मी दुनिया का हिस्सा रहकर भी पूरी तरह मायानगरी की चकाचौंध में नहीं उतर पाए. वो अपने दोस्त महेश भट्ट के साथ ‘ओशो’ की किताबें पढ़ते थे. जब वे 26-27 साल के थे उन्हें मौत को लेकर ऐसे अनुभव हुए कि वे ओशो के पास चले गए.



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विनोद अपने एक इंटरव्यू में बताया था, ‘मौत ने जिंदगी की सच्चाई से मेरा सामना करवा दिया. मेरे परिवार में छह-सात महीने में चार लोग एक के बाद एक मर गए. उनमें मेरी मां भी थी. मेरी एक बहुत प्यारी बहन थी. जिससे मेरा गहरा लगाव था. मेरी जड़ें हिल गई. मैंने सोचा ‘ एक दिन मैं भी मर जाऊंगा और मैं खुद के बारे में कुछ भी नहीं जानता हूं. दिसंबर 1975 में एकदम मैंने तय किया कि मुझे ओशो के पास जाना है. मैं दर्शन के लिए गया. ओशो ने मेरे से पूछा, क्या तुम संन्यास के लिए तैयार हो? मैंने कहा, मुझे पता नहीं, लेकिन आपके प्रवचन मुझे बहुत अच्छे लगते है. ओशो ने कहा तुम संन्यास ले लो. तुम तैयार हो. बस, मैंने संन्यास ले लिया’


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फिल्में छोड़कर 5 साल के लिए चले गए ओशो के आश्रम, धोए बर्तन

कॅरियर के पीक पर अचानक खन्ना ने फिल्मों से कुछ समय के लिए नाता तोड़ लिया और आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश को फॉलो करने लगे. उनके कहने पर और मन की शांति के लिए उन्होंने सन्यास ले लिया. करीब 5 साल उन्होंने वहां ओशो के यहां बर्तन मांजे और माली का काम किया. माना जाता है कि इस वजह से उनके और उनकी पत्नी के सम्बधों में दरार आ गई.



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5 साल बाद एक बार वह फिर फिल्मी दुनिया में वापस लौटे और उसके बाद ‘इंसाफ’ और ‘सत्यमेव जयते’ जैसी हिट फिल्में दी. राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर कटाक्ष करती इस फिल्म ‘मेरे अपने’ को विनोद खन्ना की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक माना जाता है…Next




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