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गरीब एवं पिछड़े छात्रों को इस शिक्षक ने दिया नया रास्ता, दुनिया भी है इनकी मुरीद

Posted On: 22 Apr, 2017 Infotainment में

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ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो गरीब बच्चों के सपनों को पूरा करने में अपना जीवन लेते हैं. पटना के आनंद कुमार ऐसे ही व्यक्ति हैं. आज दुनिया आनंद कुमार को ‘सुपर 30’ संस्था के संस्थापक के रूप में जानती है. हर साल उनकी संंस्था से निकले बच्चे विश्व में नाम कमाते हैं, लेकिन उनकी यह सफलता इतनी आसान नहीं थी. उन्होंने खुद को इस काबिल बनाने के लिए बहुत मेहनत की है. आइए जानते हैं उनकी प्रेरणादायक कहानी के बारे में.


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1. 2002 में हुई थी सुपर 30 की शुरुआत

आनंद गणित में बेहद तेज थे, घर की हालत नाजुक थी इसलिए उन्होंने ‘रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स’ खोला. इस स्कूल में हर तरह की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों को कोचिंग कराई जाने लगी. लेकिन उन्हें धक्का तब लगा जब कई बच्चे 500 रूपये की फीस चुका ना पाने के कारण कोचिंग छोड़कर जाने लगे. तब आनंद ने कुछ पैसै जोड़कर एक कमरा लिया और वहीं पर ‘सुपर 30’की नींव रखी.


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2. जरूरतमंदोंं को देते हैंं नि:शुल्क आईआईटी की कोचिंग

2002 मेंं जब आनंद ने इसकी शुरुआत की थी तो उन्हें भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनके 30 में से 18 बच्चे आईआईटी प्रवेश परीक्षा में अव्वल आएंगे. उसके बाद 2004 में 30 में से 22 बच्चों और 2005 में 26 बच्चों को सफलता मिली. उनकी इस सफलता का डंका पूरे देश मेंं बजा और लोगों ने उनके जज्बे को खूब सराहा.


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3. गरीब छात्रों को ही पढ़ाते हैं आनंद

आनंद ने हाल ही में घोषणा की है कि वह जल्द ही 10वीं कक्षा के छात्रों को भी नि:शुल्क शिक्षा देंगे ताकि वह अपना भविष्य संवार सकेंं. उन्होंने कहा, ‘वह गरीब बच्चों को इसलिए शिक्षा देते हैंं क्योंकि वह गरीब हैंं.’ उनके पास इतने पैसे नहीं है कि वो शहरों में जाकर लाखों की फीस दे सकें. वह उनकी मेहनत और लगन को सहारा बनाते हैं और तभी ये ‘सुपर 30’ इस मुकाम पर पहुंचा है.


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4. खुद की मेहनत से चलाते हैं सुपर 30

‘सुपर 30’ की अपार सफलता के बाद कई लोगों ने उन्हें अपना सहयोग देने की बात कही लेकिन आनंद ने कहा कि, ‘वह अगर ऐसा करेंगे तो शायद उनकी शिक्षा का स्तर गिर जाएगा वह शिक्षा को व्यवसाय नहीं बनाना चाहते इसलिए वह जैसा काम कर रहे हैं वैसा ही करते रहेंगे.’


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5. विदेशी भी मान चुके हैं सुपर 30 का लोहा

डिस्कवरी चैनल ने ‘सुपर 30′  पर एक घंटे की फिल्म बनाई थी, जबकि ‘टाइम्स’ पत्रिका ने ‘सुपर 30′ को एशिया का सबसे बेहतर स्कूल कहा है. आनंद को देश और विदेश में कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. कई विदेशी विद्वान उनका इंस्टीट्यूट देखने आते हैं और आनंद कुमार की सफलता को समझने की कोशिश करते हैं.



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आनंद कुमार ने जिस तरह से अपनी किस्मत से लड़कर दुसरों का भविष्य सुधारा है उससे हमें प्रेरणा लेनी चाहिए. खुद के लिए तो हर कोई जीता है लेकिन आनंद दूसरों के सपनों के लिए जी रहे हैं. आनंद कुमार मानते हैं कि सफल होने के लिए प्रबल प्रयास, सकारात्मक सोच, कठोर परिश्रम और धैर्य की जरूरत होती है…Next



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