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अगर ऐसा हुआ तो कभी नहीं देख पाएंगे सर्कस

Posted On: 7 Dec, 2015 Others में

Chandan Roy

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जब किसी नगर या ग्राम में सर्कस होता था तो सपरिपार मिलकर सर्कस देखने जाते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है, गांव या नगर में सर्कस करने वाले बहुत ही कम देखने को मिलते हैं. ऐसा लगता है मानों बाघ की तरह सर्कस भी विलुप्त हो चुका है. सर्कस की इस दुर्दशा के पीछे कई कारण हैं, लेकिन भारतीय दर्शक मनोरंजन के लिए सर्कस को हमेशा याद रखते आएं हैं. आज ज्यादातर सर्कस का कारोबार बंद हो चूका है. ये कलाकार कई तरह की समस्याओं से गुजर रहे हैं. जानिए सर्कस के बंद होने के पीछे का कारण…


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कम मेहनताना- सर्कस एक ऐसा व्यवसाय है जहां हर वक्त कलाकार अपनी जान की परवाह किए बगैर लोगों का मनोरंजन करते हैं. लेकिन हैरानी तब होती है जब उनकी जान की कीमत दो वक्त की रोटी से ज्यादा कुछ नहीं होता. वर्षों से काम करने के बाद भी ये कलाकार मुश्किल से अपना घर चला पाते हैं. आर्थिक तंगी के चलते ये कलाकार अन्य व्यवसाय का विकल्प तलाशते हैं.



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वर्तनाम में सर्कस की संख्या- पिछले 15 सालों में सर्कस कराने वाले संस्थाओं की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से कमी आई है. 15 साल पहले भारत में 350 से भी ज्यादा सर्कस थे, परन्तु वर्तमान में यह संख्या घटकर मात्र 11 से 12 हो चुकी है. सर्कस का यह आंकड़ा निश्चित रूप से आश्चर्यजनक है. इतनी भारी संख्या में सर्कस का बंद होना हुनरमंद कलाकारों के लिए रोजीरोटी की समस्या उत्पन्न कर रही है.


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जानवरों पर प्रतिबंध- जानवरों के प्रति सख्त कानून होने की वजह से भी कोई सर्कस में रुचि नहीं लेता. दर्शक जानवरों के हैरतअंगेज कारनामें देखना चाहते हैं और जब शो के दौरान ऐसा नहीं होता है तो उन्हें निराशा होती है. हालांकि सर्कस मालिकों का कहना है कि प्रतिदिन जानवरों के भोजन-पानी और देख-रेख में 25,000 से 30,000 रुपए खर्च किए जाते हैं.


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सामाजिक भेदभाव- सर्कस के कलाकारों की हमेशा से यह शिकायत रही है कि समाज में लोग इन्हें अलग नजरिये से देखते हैं और खासकर जब कोई कलाकार “जोकर” हो. 40 वर्षीय बीजू पिछले 25 सालों से ‘रैंबो सर्कस’ में ‘जोकर’ का किरदार निभा रहे हैं. उनका कहना है कि- वह अपनी पत्नी या बच्चों को नहीं बताना चाहते कि वह सर्कस में जोकर हैं. उन्हें डर है कि लोग उनके बच्चों को ‘जोकर का बेटा’ कहकर न चिढ़ाने लगें.


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तकनीक की कमी- सर्कस मालिकों का कहना है कि तकनीक की वजह से मनोरंजन के अन्य माध्यमों का विकास हुआ लेकिन सर्कस आज भी वहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण आर्थिक तंगी. यदि सरकार द्वारा इन सर्कसों को कुछ मदद मिल जाए तो सर्कस की दुनिया फिर से चल पड़ेगी. वहीं दूसरी तरफ उनकी स्थिति यही रही तो उनके इतिहास बनने में ज्यादा दिन नहीं लगेगा Next…


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Jitendra Mathur के द्वारा
December 8, 2015

सर्कस वालों का दर्द भी उन्हीं दर्दमंदों के दर्द की तरह नजाना और नज़रअंदाज़ किया हुआ है जिनका कोई वोट बैंक नहीं है । मुझे लगता है कि इस अद्भुत विधा का भारत के बाहर तो जीवित रहना संभव है लेकिन भारत की भ्रष्ट व्यवस्था जिसमें धन और वोट के बैंक ही शक्ति-संतुलन का आधार हैं, में यह जीवित नहीं रह सकता । अब इसमें लागत बहुत अधिक है और आय बहुत कम । ऐसे में मनोरंजन और प्रेरणा का यह विलक्षण माध्यम कैसे जीवित बचे । अनेक भारतीय लोक कलाओं की भांति यह भी मृत्यु को प्राप्त होने जा रहा है । दुखद है यह । लेकिन क्या किया जाए ? कितनी विचित्र बात है कि सर्कस में जानवरों के प्रयोग पर तथाकथित पशु-प्रेमी और पेटा वाले भाग-भाग कर प्रतिबंध लगते हैं लेकिन वे देश में चल रहे असंख्य वधिक-गृहों यानि कि क़त्लखानों में प्रतिदिन मारे जा रहे निर्दोष पशुओं का जीवन नहीं बचा सकते क्योंकि उन्हें चलाने वाले लाखोंकरोड़ों वोटों पर नियंत्रण रखते हैं । ईश्वर ही सहायता करे भारत में सर्कस के प्रति समर्पित लोगों की ।


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