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देश के इस प्रतिष्ठित संस्थान को क्यों छोड़ रहे हैं छात्र?

Posted On: 6 Aug, 2015 Infotainment में

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इंजीनियरिंग का क्रेज़ युवाओं में कुछ ज्यादा है. विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश के युवा छात्रों में. बारहवीं बोर्ड की स्कूली परीक्षा के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ समझे जाने वाले इंजीनियरिंग संस्थानों में दाखिले के लिये प्रवेश परीक्षा की तैयारी जोर-शोर से शुरू हो जाती है. टाइम टेबल किराये के कमरों की दीवारों पर टँग जाते हैं. ट्रिग्नोमेट्री के फॉर्मूले, धातुओं के नाम से संबंधित पोस्टर दीवारों को होली के रंगों में रंग देती है. एक-दो साल की मेहनत के बाद कई लोग मनचाहे इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश लेने में सफल हो जाते हैं जबकि कई लोग रेत की ऊँचे टीलों-सी फीस चुकाकर निजी संस्थानों के दरवाज़े से अंदर होते हैं. छोटे-छोटे कस्बों से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रवेश लेने वाले छात्र उन सपनों से रूबरू होते हैं जो उन्हें कुछ सालों से जगाये रखती है.



IIT Drop outs


भारत में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की संख्या 16 है वहीं राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की कुल संख्या 30 है. आँकड़े बताते हैं कि इन संस्थानों में प्रवेश लेने वाले युवाओं की ड्रॉप आउट संख्या भी सोचनीय है. वर्ष 2014-15 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों से ड्रॉप आउट की संख्या 757 है जबकि वर्ष 2013-14 में यह 697 थी. वर्ष 2014-15 में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों से ड्रॉप आउट संख्या 717 रही जो वर्ष 2013-14 में 785 थी.


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इस ड्रॉप आउट के कारण भी अलग-अलग तरह के हैं. कोई किसी दूसरे संस्थान में प्रवेश के कारण इन संस्थानों को छोड़ देते हैं तो कई चिकित्सीय कारण और कुछ व्यक्तिगत कारणों से. पीजी के दौरान नौकरियाँ लग जाने के कारण भी छात्र संस्थान छोड़ कर चले जाते हैं. इन सबके बीच चौंकाने वाला कारण छात्रों पर अकादमिक दबाव है. ऐसा तब है जब अकादमिक दबावों से निपटने के लिये इन इंजीनियरिंग संस्थानों में परामर्श की व्यवस्था की गयी है.


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अभी कुछ दिनों पहले ही नारायणमूर्ति ने शिक्षण संस्थानों में नवाचारों को प्रोत्साहन देने की बात की थी. सम्भव है कि इन शिक्षण संस्थानों को परम्परागत शिक्षण पद्धति के बजाय नवोन्मेष आधारित बनाकर ड्रॉप आउट की बढ़ती संख्या पर लगाम लगायी जा सकती है.Next…..

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