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इस ऐप के जरिए केवल 15 मिनट में एचआईवी टेस्ट की करें जांच

Posted On: 6 Feb, 2015 Others में

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सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज में जो दो बीमारियां विश्वभर में सर्वाधिक मौतों की जिम्मेदार है वे है एड्स और सिफिल्स रोग. विश्व भर में करोड़ों लोग इन दोनों बीमारियों से पीडित हैं. अगर इन बीमारियों का पता शुरूआती चरण में लग जाए तो इनपर असानी से नियंत्रण पाया जा सकता है. पर समस्या यह है कि इन दोनों बीमारी के शुरूआती लक्षण बेहद छुपे हुए होते हैं और इनका पता लगाना बेहद मुश्किल होता है. कई बार रोगी जांच के महंगा होने के कारण भी जांच केंद्र में जाने से कतराते हैं साथ ही जांच की महंगी तकनीक होने के कारण इसकी उपलब्धता भी बेहद सीमित है. खैर , खुशखबरी यह है कि जल्द ही यह सभी समस्याएं गुजरे जमाने की बात होने जा रही है. कैसे? आईए जानते हैं.



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एक विज्ञान पत्रिका में छपे रिसर्च के अनुसार वैज्ञानिकों ने एक ऐसा स्मार्टफोन ऐप विकसित किया है जो सिफिल्स और एचआईवी की जांच करेगा वह भी महज 15 मिनट में. कोलंबिया विश्वविद्यालय के बायोमेडिकल विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया यह सॉफ्टवेयर चंद मिनटों में खून के नमूनों का जांच कर सकता है. खून के इन नमूनों को फिंगर प्रिट डोंगल द्वारा कलेक्ट किया जाता है. इस डोंगल को किसी भी स्मार्टफोन या कंप्यूटर से जोड़कर महज 15 मिनट में पता लगाया जा सकता है कि खून के नमूने में एचआईवी वायरस या सिफिल्स के बैक्टिरिया मौजूद हैं या नहीं.


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यह टेस्ट किट पारंपरिक लैब टेस्टिंग मशीनों से तकरीबन 540 गुना सस्ता है. पायलट टेस्ट  के रूप में इस किट का प्रयोग रावांडा के कुछ मरीजों पर किया गया और यह बेहद सफल रहा. यह डोंगल बेहद छोटा है जिसे आसानी से हाथ में पकड़ा जा सकता है. इसका इस्तमाल दूर-दराज के इलाकों में असानी से किया जा सकता है जहां मेडिकल सुविधाओं की पहुंच बहुत कम है.


वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस उपकरण की मदद से उन गर्भवती महिलाओं को पहले ही अगाह किया जा सकता है जो एचआईवी संक्रमित हैं या सिफिल्स की बीमारी से ग्रसित हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अविष्कार विश्व भर में प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा. इसका लाभ मुख्य रूप से उन विकासशील देशों में ज्यादा होगा जहां स्वास्थ सेवाओं की स्थिती बेहद खराब है. गौरतलब है कि एचआईवी संक्रमण और सिफिल्स के अधिकांश मामले विकासशील अफ्रीकी और एशियाई देशों में पाए जाते हैं.Next…


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kumarvijaynarayansingh के द्वारा
February 8, 2015

धर्म स्थापना-सूत्र धर्म का उदेश्य (अभिप्राय) :- ईश्वरीय ब्रह्माण्ड को अक्षुण रखना ही धर्म है। परन्तु ब्रह्माण्ड के नियमों में जीव जीव जीवस्य भोजनम् भी है। जिसके कारण धर्म का अक्षरशः पालन करना तथा कराना असम्भव है। इसी कारण से मानव ने धर्म के पहल मानव शब्द को जोड़ कर मानवधर्म बनाया है। ताकि मानवाधिकारों को सुरक्षा प्रदान करके प्रत्येक मानव की जीवन को सुरक्षित, निर्भय, सुखी बनाया जा सके। अर्थात् वे परिश्रम (कर्म/कर्त्तब्य) ही धर्म हैं। जिन्हें अपना-अपना कर मानव अपनी ईच्छाओं की तृप्ति तो कर लेवे। परन्तु सम्पादित किए जाने वाले तथा किए गए कर्त्तब्यों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूपों से किसी भी दूसरे निर्दोष मानवों को दुःख नहीं पहुँचने पावे। परन्तु जिन बौद्धिक राजनीतिज्ञों को धर्म (कानून) को चिन्हित करने, अपनाने, अपनाने के लिए नागरिकों को विवश करने तथा कराने के उदेश्य से उत्तरदायित्व सौंपे गए हैं। वे ही धर्म तथा कानून को अपने ऐय्याशी करने के लिए उपयोग कर रहें हैं। ऐय्याशी करने का तात्पर्य अपनी अनन्त ईच्छाओं को पूर्ण करना है। जिसे पूर्ण करने के लिए दूसरे निर्दोष मानवों के हकों को छीनना (शोषण करना) अनिवार्य होता है। जबकि कोई भी जीवात्मा या मानवात्मा अपना हक छीनने नहीं देना चाहती है। फलस्वरूप खूनी संघर्ष होना तथा महाविनाश होना आरम्भ हो जाता है। जैसा कि वर्त्तमान समय में विश्व भोग रहा है। धर्म को स्थापित करने के उदेश्य से ही ईश्वर को माना गया है। ताकि ईश्वरीय ब्यवस्था में स्थापित किए गए नारकीय प्रताड़ित जीवन से भयभीत हो कर तथा स्वर्ग में मिलने वाले अनन्त आनन्द प्राप्त करने के लाभ से मानव उत्प्रेरित होता रहे। क्योंकि ईश्वरीय ब्यवस्था कण-कण में विराजमान है। फलस्वरूप अँधेरा, उजाला तथा सुनसान में किए गए अपराधिक तथा धार्मिक कर्मों को ईश्वर देखता रहता है। फलस्वरूप झूठ का गुजारा नहीं हो पाता है। बल्कि कर्मों के लिए निर्धारित फल प्राप्त होना अटल (सुनिश्चित) होता है। इसीलिए श्रीकृष द्वारा गीताज्ञान में कहा गया है कि फल की चिन्ता करने की आवश्यक्ता नहीं है। क्योंकि ईश्वर निष्पक्ष, ईमानदार तथा न्यायी है। वह पक्षपात नहीं करता है। क्योंकि मानवात्माएँ ईश्वरीय आत्मा की ही सूक्ष्म रूप हैं। ईश्वर ने मानवों को विलक्षण, चिन्तनशील, तर्कशील तथा खोजी मस्तिष्क को प्रदान किया है। ताकि मानव स्वयं आत्ममंथन करके भी धार्मिक प्रावधानों की समीक्षा करता रहे तथा ईश्वरीय धर्म की आड़ में ठगा नहीं जा सके। अंधविश्वासी बनने की ईजाजत ईश्वर नहीं दिया है। जब-जब कानूनों का दुरूपयोग शासक ऐय्याशी करने के लिए करने लगता है। तब-तब मानवाधिकारों की हत्याएँ होना आरम्भ होतीं हैं। तब – तब ही मानवनिर्मित भौतिक समस्याएँ उत्पन्न होतीं हैं, विकराल बनतीं हैं तथा महाविनाश होने के लिए विश्व को अग्रसर करतीं रहतीं हैं। जिस प्रकार से वर्त्तमान विश्व महाविनाश की ओर ही तीब्रता से अग्रसर होता चला जा रहा है। महाविनाश को रोकने का एकमात्र उपाय धर्म की पुनर्स्थापना करना ही है। महाविनाशकारी पापी राजनैतिक शासकों का तथा उन्हें साथ देने वालों का सर्वनाश करना ही मूल धर्म है। यही गीता का ज्ञान भी है। पापी चाहे अपना वंश भी क्यों नहीं हो। पापी से मोह करना ही विनाश को प्रश्रय देना है।


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