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मां दुर्गा के मस्तक से जन्म लेने वाली महाकाली के काले रंग का क्या है रहस्य?

Posted On: 17 Apr, 2014 Infotainment में

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धार्मिक विभिन्नताओं के देश भारत में लाखों की संख्या में देवी-देवताओं की आराधना की जाती है. इन्हीं दैवीय शक्तियों में एक रूप महाकाली का भी है, जो दुष्टों का संहार करने के लिए संसार में अवतरित हुईं. काल (समय) के नारी सुलभ रूप में अवतरित हुई ‘महाकाली’ को सृजन, संरक्षण और विनाश की देवी कहा जाता है. देवी के नौ रूपों में से एक काली महिला सशक्तिकरण की एक अचंभित करने वाली मिसाल हैं, जिनसे हर कोई भय खाता है.


mahakali


महाकाली को दुर्गा का अवतार कहा गया है और धरती पर इनके अवतरित होने से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित हैं. जब मां दुर्गा महिषासुर नामक राक्षस के साथ युद्ध कर रही थीं, तो वह इतनी क्रोधित हो गईं कि उनके मस्तक की ज्वाला से मां काली अवतरित हुईं. गहरे काले रंग में बेहद विशाल काया वाली महाकाली ने सारे राक्षसों को मार डाला और उनके रक्त का सेवन किया. मां दुर्गा जिन-जिन असुरों का संहार करती गईं, महाकाली ने उनके सिर काटकर अपने गले में लटका लिए. सारे राक्षस मारे गए लेकिन फिर भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ. क्या राक्षस, क्या देव सभी उनके कोप के भागी बनने लगे और संसार का विनाश होता देख, उन्हें शांत करने के लिए भगवान शिव, स्वयं उनके पति, उनके पैरों के नीचे लेट गए. उन पर पांव रखते ही महाकाली शांत हो गईं. उन्हें इस बात का भारी पश्चाताप था कि उन्होंने अपने पति पर पैर रख दिया.


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दूसरी मान्यता मां पार्वती से संबंधित है. इसके अनुसार पार्वती के शरीर की मैल से काली का उद्भव हुआ. इसलिए काली का रंग काला और पार्वती का श्वेत है. मां काली के इस काले रंग को विनाश और सृजन से भी जोड़ा जाता है.


तीसरी मान्यता के अनुसार काली का निर्माण देवी अम्बिका ने असुरों के संहार के उद्देश्य से किया था. अवतरित होने के साथ ही काली ने चंड और मुंड नाम के दो राक्षसों के जीवन का संहार किया. इन दोनों असुरों को मारने के बाद काली को रक्तबीज नाम के असुर सम्राट की सेना से लड़ना पड़ा. रक्तबीज के रक्त की हर बूंद से एक और रक्तबीज का निर्माण होता था इसलिए उसकी सेना निरंतर बढ़ती जा रही थी. रक्तबीज को मारने के लिए महाकाली ने उसके शरीर में मौजूद खून की एक-एक बूंद पी ली और उसकी सारी प्रतिकृतियों को खा गईं. रक्तबीज को मारने के पश्चात काली क्रोध में तांडव करने लगीं और उन्हें शांत करवाने के लिए भगवान शिव को उनके पैरों के नीचे लेटना पड़ा. काली शांत हो गईं और शर्म की वजह से उन्होंने अपनी जीभ बाहर निकाल ली.


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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

uday bhan pal के द्वारा
June 21, 2014

very good


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