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अर्जुन ने युधिष्ठिर का वध कर दिया होता तो महाभारत की कहानी कुछ और ही होती. पर क्यों नहीं किया था अर्जुन ने युधिष्ठिर का वध?

Posted On: 14 Apr, 2014 Infotainment में

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कहते हैं विधाता की मर्जी के बिना कुछ नहीं होता पर कभी-कभी विधाता कुछ ऐसा करता है जो इंसानी रिश्तों में बड़े अजीब से हालात पैदा कर देते हैं. महाभारत और रामायण की कहानियां बचपन से हम सुनते आते हैं. किसी न किसी रूप में यह हमें कोई राह दिखाती हैं और इनकी कहानियों को सीख के रूप में ही हमेशा देखा जाता है पर महाभारत-रामायण युग में भगवान के अवतार होने के बावजूद कुछ ऐसे उलझे हुए रिश्ते थे जिन्हें जानकर आप हैरान हो जाएंगे.

Mahabharata



महाभारत में पांडव के धनुर्धर और श्रीकृष्ण के गौरव अर्जुन के साथ भी ऐसा ही प्रसंग जुड़ा हुआ है. बात तब की है जब पांडव 12 वर्षों के अज्ञातवास पर थे. द्रौपदी के साथ पांडव विराटनगर के राजा के यहां उनके सेवक बनकर रह रहे थे. उसी समय दुर्योधन ने विराट नगर पर हमला कर इसे जीतने की रणनीति बनाई. इसलिए भीष्म पितामह और कर्ण समेत सेना लेकर दुर्योधन युद्ध के लिए विराट नगर की सीमा पर पहुंच गया. विराट नगर के राजकुमार उत्तर को यह बात पता चली तो वह दुर्योधन से युद्ध करने चल दिया. उस वक्त अर्जुन किन्नर के रूप में विराट नगर के राजमहल में रहते हुए राजकुमारी उत्तरा को नृत्य की शिक्षा दे रहे थे. उत्तर के सारथी के रूप में वही उसके साथ थे. पर युद्धभूमि पहुंचकर दुर्योधन की विशाल सेना देखकर उत्तर भागने लगा. तब अर्जुन ने उत्तर को अपनी सच्चाई बताई और दुर्योधन की सेना से युद्ध कर उसे जीता. जब विराट नगर सम्राट को इसका पता चला उन्होंने अर्जुन से अपनी पुत्री उत्तरा से विवाह का प्रस्ताव रखा लेकिन अर्जुन ने किन्नर रूप में उत्तरा के नृत्य-गुरु होने के कारण उत्तरा से पिता-पुत्री के समान संबंध होने की बात कहकर उत्तरा से विवाह का प्रस्ताव अस्वीकर कर दिया. पर विराट सम्राट से उत्तरा से अपने पुत्र अभिमन्यु से विवाह करने की इच्छा जताते हुए उसे अपना पुत्रवधू बनाने की बात कही. इस तरह उत्तरा अर्जुन की पत्नी और अभिमन्यु की मां बनते-बनते अर्जुन की पुत्रवधू और अभिमन्यु की पत्नी बन गईं.

Krishna Arjun Samvad

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बात तब की है जब कर्ण से युद्ध में युधिष्ठिर हार गए और घायल होकर शर्म से अपने निवास स्थान आ गए. अर्जुन यह जानकर कृष्ण के साथ युधिष्ठिर से मिलने आए. युधिष्ठिर को लगा कि अर्जुन कर्ण को पराजित कर उनका बदला लेकर युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेने आए हैं लेकिन ऐसा नहीं हुआ जानकर वह अर्जुन पर क्रोधित हो उसे अपना शस्त्र किसी और को दे देने का आदेश दे दिया. इस पर क्रोधित हो अर्जुन ने युधिष्ठिर पर तलवार उठा ली क्योंकि यह अर्जुन की प्रतिज्ञा थी कि जो कोई भी उनसे अपना शस्त्र देने को कहेगा वह उसकी हत्या कर देंगे. तब भगवान श्री कृष्ण ने अपमानित मनुष्य के मरे होने के समान होने की बात समझाकर अर्जुन से युधिष्ठिर का अपमान कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने को कहा. अर्जुन ने ऐसा ही किया और पहली बार गुरु समान अपने बड़ी भाई को अपशब्द कह अपनी प्रतिज्ञा पूरी की.

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak jayant के द्वारा
April 15, 2014

हिन्दुओ के ठेकेदारो से मेरा एक सवाल है। पुरी धरती पर देवताओ को रहने के लिए भारत ही क्यो नजर आया वैसे भारत देव नगरी कहलाती है फिर भी यहाँ पर सबसे ज्यादा झुट व बेइमानी होती है । यहाँ पर भक्त सबसे ज्यादा दर्दनाक मोत मरते है ऎसा क्यो

    Deepak tyagi के द्वारा
    November 26, 2014

    mere bacche jayant aisa is lye hai kyoke devtao ko janam lene k lye punya bhoomi ki jarurat hoti hai jaise aam ka vriksh kisi banjar bhoomi par nahi oog sqkta vaise hi devta aise jagha pe janam nahi le sakte jaha adaharm ho. agar tumne kabi padhai likhai kari ho daram k bare me to is baat ko kahi pe b padh lena. or mere bacche tumne panjiyana island ka naam to suna hi hoga bachpan me agar na suna ho to 5v class ki book uthaa lena or dekh lena k karodo saal pahle dharti ek hi island thi phr baad me toot kar alag hui.

    pinky के द्वारा
    January 2, 2015

    sab karm ne anusar milta hai ,, satya ka yug tha tab bhi pap hote the abb bhi hote hai,,, dard nak mout hai ke nahi ye hume nahi pata jo hume dikhata hai use hum dardnak kehte hai ,,, lekin ishwer sab soch samaj kar thik hi karta hai,,, kabhi uske fesle pan sandeh mat karo,,,,


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