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ऐसा मेला जहां सिर्फ आत्माएं नाचती हैं !!

Posted On: 22 Nov, 2012 Others में

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एक गांव जहां भूतों का मेला लगता है, जी हां आज भले ही विज्ञान और तकनीक अपने चरम पर पहुंचकर मनुष्य की सभी जिज्ञासाओं, जरूरतों और परेशानियों का हल खोज रहे हैं लेकिन भारत जहां अभी भी अंधविश्वास अपना सिर उठाए खड़ा रहता है वहां कुछ सवालों पर शायद विज्ञान भी अपना जवाब देने से डरता है.

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अब बिहार के एक गांव की ही बात कर लेते हैं जहां एक बाबा विज्ञान की सभी स्थापनाओं, दवाओं और इलाज के इतर जाकर भूत प्रेतों का मेला लगाता है. आस्था के नाम पर यह अंधविश्वास का खेल होता है बिहार के पश्चिम चंपारण स्थित गोबरहिया गांव में. इस गांव में प्रत्येक माह की पूर्णिमा के दिन यह मेला लगता है. उल्लेखनीय बात तो यह है कि इस गांव में ना सिर्फ बिहार के लोग शामिल होते हैं बल्कि उत्तर-प्रदेश के अलावा नेपाल से भी कई लोग अपनी परेशानियों के समाधान के लिए बाबा के पास आते हैं. हजारों की संख्या में महिलाएं बाबा के दरबार में हाजिरी लगाकर उनसे अपनी समस्याओं को समाप्त करने की गुहार लगाती हैं.


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आस्था के नाम पर लगने वाले इस मेले में पीड़ितों और भक्तों की संख्या में हर साल वृद्धि होने लगी है. हजारों भक्तों के आराध्य बाबा पीड़ित महिलाओं को पहले झाड़-फूंक के जरिए ठीक करते हैं फिर उन्हें एक पेड़ में कील ठोंककर वहां बांध देते हैं. वाल्मीकि नगर व्याघ्र परियोजना के अधीनस्थ गोबरहिया गांव में आज से चार वर्ष पूर्व मिट्टी की एक शिला बनाकर पीपल के पेड़ के नीचे पूजा शुरू हुई थी, धीरे-धीरे अंधविश्वास का जाल फैलता गया और अब यह बाबा धर्म के नाम पर भूतों से निजात दिलवाने का काम करने लगे हैं.


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ऐसे मिलता है प्रेतों से छुटकारा !!

पूर्णिमा से एक दिन पहले हजारों महिलाएं इस स्थान पर पहुंच जाती हैं और अगले दिन सुबह सबसे पहले गांव के समीप बहने वाले तालाब में स्नान करती हैं. स्नान करने के बाद पीपल के पेड़ के नीचे वह सभी एक लाइन में खड़ी हो जाती हैं और जिस ओर बाबा ध्वज गाड़कर रखते हैं उस पर अपना ध्यान एकत्रित करती हैं. इसी बीच पुजारी हरेन्द्र दास उर्फ लालका बाबा आते हैं और लाइन में बैठी पीड़िताओं को एक कुआं से जल निकालकर पीने के लिए देते हैं. जैसे ही महिलाएं जल पीती हैं उन पर प्रेत का साया आ जाता है और फिर वह झूमने और अजीबोगरीब हरकतें करने लगती हैं.


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पीड़ित महिलाएं जमीन पर हाथ-पैर पटक-पटक कर चिल्लाने लगती हैं और कुछ अपने सिर को हिलाते हुए गीत गाने लगती हैं. फिर कुछ देर बाद बाबा महिलाओं को जल पिलाते हैं और थोड़ी ही देर में सभी महिलाएं शांत हो जाती हैं. फिर देर रात झाड़-फूंक के बाद बाबा के द्वारा पीपल के पेड़ में एक-एक कील ठोंककर यह कहा जाता है कि तीन बार यहां आने के बाद भूत खुद ही भाग जाएगा.


अब इस श्रद्धा में या यूं कहें अंधी भक्ति के पीछे कितनी सच्चाई है यह तो हम या आप नहीं बता सकते क्योंकि यह तो भक्त और बाबा के बीच का मसला है. हम तो बस यह कह सकते हैं कि आज के जमाने में जहां भूत-प्रेत जैसी बातें अपना वजूद खोती जा रही हैं वहां इन सब दकियानूसी विचारों को मानना अचंभित तो जरूर करता है.

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jack के द्वारा
November 22, 2012

भूतों का मेला.. अजीब किस्सा है 21 सदी में भी लोगों का भूत पर विश्वास यह साबित करता है कि इंसान और विज्ञान से ऊपर की शक्ति भगवान ही हैं.


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